वंश-ब्रह्मण- इस ब्रह्मण ग्रन्थ में सामवेदीय गुरुओं के वंश परम्परा का वर्णन है । यह तीन खण्डों में विभक्त है ।
उपनिषद् ब्रह्मण- यह ब्रह्मण दो भागों में विभक्त है
,कुल प्रपाठकों की संख्या १० है ,प्रथम भाग में
२ प्रापाठक है तथा २ भाग में ८ प्रपाठक है । द्वितीय भाग को
छान्दोग्योपनिषद् कहते है ।
तवल्कार या जैमिनीय ब्रह्मण- यह जैमिनीय शाखा का ब्रह्मण ग्रन्थ है । इसमें कुल ५ अध्याय है
,प्रथम,द्वितीय, तृतीय अध्याय में यागानुष्ठानों का वर्णन है । चतुर्थ अध्याय में उपनिषद् ब्रह्मण
है , तथा पञ्चम अध्याय में आर्षोय ब्रह्मण है ।
सामवेदीय-
आरण्यक ग्रन्थ
सामवेद में कुल दो आरण्यक ग्रन्थ प्राप्त होते है-
१- तवल्कार या जैमिनीय आरण्यक
२- छान्दोग्य आरण्यक
तवल्कार या जैमिनीय आरण्यक- यह जैमिनीय शाखा का आरण्यक ग्रन्थ है
। यहा तलव का अर्थ संगीत विद्या से है । इसमें कुल ४ अध्याय है जो अनुवाकों में विभक्त है , इसके चतुर्थ अध्याय
के दशम अनुवाक को केनोपनिषद् कहते है ।
छान्दोग्य आरण्यक- यह
ताण्डय ब्राह्मण से सम्बद्ध आरण्यक है ।
इसको सत्यब्रत सामश्री जी ने सामवेद आरण्यक संहिता के नाम से प्रकाशित किया
है ।
सामवेदीय उपनिषद् ग्रन्थ
छान्दोग्य उपनिषद्- यह तवल्कार शाखा से सम्बद्ध उपनिषद् है , इसमें
कुल ८ अध्याय है । अध्याय विभक्त है खण्डो १५४ में यह पूर्णतया गद्यात्मक ग्रन्थ है ।
प्रतिपाद्य विषय- प्रथम अध्याय में साम एवं उद्गीथ के महत्व के बारे में बताया गया
है ।
द्वितीय अध्याय में ओम तथा
साम के भेद वर्णित है । साम को अहंकार कहा गया है ।
तृतीय अध्याय में ब्रह्म के व्यक्त स्वरुप का वर्णन है । तथा
सूर्योपासना का वर्णन है । अण्ड से सूर्योत्पत्ति का वर्णन है ।
चतुर्थ अध्याय में सत्यकाम जाबालि तथा रैवत आख्यान का वर्णन है ।
पञ्चम अध्य़ाय में बृहदारण्यक की कथाओं का वर्णन है । तथा इन्द्रियों की श्रेष्ठता का वर्णन प्राप्त
होता है । श्वेतकेतू,आरूणेय एवं प्रहवण जैबलि के संवाद वर्णन तथा
६दार्शनिकों के आत्मविषयक
चिंतन का चित्रण किया गया है ।
षष्ठ अध्याय आरुणि ब्रह्मविद्या
के उपदेश का वर्णन है । तथा तत्वमसि महावाक्य इसी उपनिषद्
में वर्णित है । दहर विद्या का वर्णन इसी में किया गया है । आत्मा की ४
अवस्थाओं का वर्णन भी प्राप्त होता है ।
केनोपनिषद् - यह जैमिनीय शाखा से सम्बद्ध उपनिषद है । इसका प्रारम्भ वाक्य केनेषितं पतति
है । यह ४ खण्डों में विभक्त है । प्रथम के दो खण्डों में ब्रह्म की अनिर्वचनीयता
का वर्णन है । तृतीय एवं चतुर्थ में उमा-हेमवती आख्यान का वर्णन किया गया है । इसमे
कुल मंत्रों की संख्या ३४ है ।
सामवेद में कुल १६ उपनिषद प्राप्त
होते है ।
सामवेदीय-कल्पसूत्र
श्रोतसूत्र- आर्षेय या मशक, लाट्यायन, द्वाह्ययण,जैमिनीय
गृहसूत्र- द्वाह्ययण,
गोभिल,खादिर, जैमिनीय
धर्मसूत्र- गौतम धर्मसूत्र
शुल्वसूत्र- उपलब्ध नही
सामवेदीय प्रतिशाख्य ग्रन्थ- सामप्रतिशाख्य,
पुष्पसूत्र, पञ्चविध सूत्र
शिक्षा ग्रन्थ- नारद शिक्षा
शिव त्रिपाठी
बुद्धवासरः ०२/०५/२१८
क्रमशः

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