प्रो.वसन्तकुमार म. भट्ट
पूर्व-निदेशक, भाषा-साहित्य भवन, गुजरात युनिवर्सिटी, अहमदावाद – 380 009
भूमिकाः—प्राचीन एवं
मध्यकालिक भारत वर्ष में जब यान्त्रिक मुद्रणकला नहीं थी, तब संस्कृत एवं
पालि-प्राकृत ग्रन्थों का पाठ पाण्डुलिपियों के द्वारा ही हम तक पहुँचा है । दो
सो- ढाई सो वर्ष पूर्व संस्कृत ग्रन्थों का पाठ एक पीढि से दूसरी पीढि के पास केवल
मानवकृत प्रतिलिपिकरण से ही संक्रान्त होता था । लेकिन जब भी मानवकृत प्रतिलिपिकरण होता है तब
मूल पाठ की प्रतिलिपि में जाने-अनजाने अशुद्धियाँ प्रविष्ट होती ही हैं । एवमेव,
हमारे देश की आरण्यक संस्कृति में जो लिप्यासन ( लेखन-फलक ) का विनियोग होता था,
वह वृक्षों के पर्ण होते थे । ( पर्ण से ही पण्ण, पण्ण से ही पन्ना, पान आदि तद्भव
शब्द आधुनिक आर्य भाषाओं में प्रचलित हुए हैं । ) जिसके कारण पचास-साठ साल के बाद
उसका पुनर्लेखन करना भी आवश्यक हो जाता था । इस समय एक पुरानी पाण्डुलिपि को
आदर्श-प्रति के रूप में स्वीकार कर, उससे दूसरी पाण्डुलिपि बनाई जाती थी । इस तरह
की प्रतिलिपिकरण की प्रक्रिया से सभी प्राचीन संस्कृत ग्रन्थों का पाठ हम तक
पहुँचा है । लेकिन जब एक ही कृति की दो या इससे अधिक पाण्डुलिपियाँ देखी जायेगी
तो, उनमें संचरित हुआ पाठ एक समान नहीं होगा । यानि एक ही ग्रन्थ की दो या इनसे
अधिक पाण्डुलिपियों में अनेक स्थान पर अपपाठ, पाठभेद, शब्दपरिवर्तन, प्रक्षेप,
संक्षेपादि प्राप्त होने लगेंगे । तब पाठक को प्रश्न होगा कि एक ही ग्रन्थकार (
कवि, शास्त्रकर्ता, टीकाकार ) ने मूल में जो भी लिखा होगा, वह तो एक ही होगा । तो
इस तरह के विभिन्न पाठभेदों/पाठान्तरों में से मूल पाठ क्या होगा?वह आज के पाठक के
लिए गवेषणीय बन जाता है । दूसरे शब्दों में कहा जाय तो मूल ग्रन्थकार और आज के
पाठक के बीच में अनेक अज्ञात लिपिकार एवं पाठशोधक (=परम्परागत पाठ को अपनी
रुचि-अरुचि के अनुसार परिष्कृत करनेवाले ज्ञानी, साम्प्रदायिक अभिनिवेश
बुद्धिवाले, कविंमन्यमान रसिक जन, रंगकर्मी लोग आदि ) खडे हैं, जिन्होंने किसी भी कृति
के मूल पाठ को अपने असली स्वरूप में से विचलित कर दिया होता है । ऐसी परिस्थिति
में, किसी भी कृति की साहित्यशास्त्रीय समीक्षा करने से पहले पाठ-समीक्षा करनी
अनिवार्य बन जाती है ।। ऐसी पाठालोचना का मुख्य लक्ष्य यही होता है कि प्राचीन या
मध्यकाल में लिखी गई कृति का पाठ, जो प्रतिलिपिकरण के दौरान बहुविध अशुद्धियों और
विकृतियों में ग्रस्त हुआ हो, उसको उसके मूल स्वरूप में या अधिक श्रद्धेय स्वरूप
में या प्राचीनतम स्वरूप में पुनः प्रतिष्ठित करना ।।
इस तरह के
पाठालोचन-शास्त्र ( Textual Criticism ) का सर्व प्रथम उदय पश्चिमी जगत् में बाईबल के पाठोद्धार के लिए हुआ था । तत्पश्चात् होमर के काव्यों और शेक्सपियर के नाटकों का पाठ परिशुद्ध करने के लिए
एवं मूल पाठ की तलाश के लिए भी उसका उपयोग होने लगा है । इन पश्चिमी विद्वानों ने
पाठालोचना की जो प्रविधि बताई है, उसमें चार सोपान है:(1) अनुसन्धान [ जिसमें
पाण्डुलिपियाँ एवं सहायक सामग्री का एकत्रीकरण, तथा उनमें उपलब्ध होनेवाली सभी अशुद्धियाँ
एवं पाठान्तरों का संतुलन-पत्रिकाओं में निरूपण करना है ], (2) संशोधन [ जिसमें प्राप्त की गई
पाण्डुलिपियों का आनुवंशिक सम्बन्ध ढूँढने के लिए उनका वंशवृक्ष सोचा जाता है,
जिससे वाचना-निर्धारण एवं लुप्त मूलादर्श-प्रति के पाठ का अनुमान लगाया जा सकता है
], (3) पाठ-सुधारणा [ पाण्डुलिपियों में प्रविष्ट हुए सभी अशुद्ध/व्याकरण-विरुद्ध/असम्बद्ध
पाठान्तरों में से एक भी पाठान्तर जब पूर्वापर सन्दर्भ में सुसंगत प्रतीत नहीं
होता है, तब अगतिकतया पाठ-सुधारणा की जाती है । ], यहाँ तक की प्रविधि को प्राथमिक
या निम्न स्तरीय ( Lower Criticism ) पाठालोचना कही जाती है[1]
। इसमें, उपलब्ध पाण्डुलिपियों के साक्ष्य को लेकर, प्राचीन से प्राचीनतर, और
प्राचीनतर से प्राचीनतम पाठान्तर की खोज करने का लक्ष्य होता है । यहाँ एकाधिक
वाचनाओं ( यानि शाखाओं ) में प्रवाहित हुए पाठों की ऐतिहासिक उत्क्रान्ति[2]
ढूंढ कर, उसी के आधार पर"मूल-आदर्श-प्रति" का ( Archetype यानि प्रथम
प्रतिलिपि का ) पाठ क्या रहा होगा?उसका अंदाजा लगाया जाता है ।, तथा पाठालोचना के
चतुर्थ सोपान पर (4) उच्चतर समीक्षा ( Higher Criticism ) होती है ।। प्रस्तुत
आलेख में, इसीकी सोदाहरण मीमांसा करना अभीष्ट है । उच्चतर समीक्षा के स्वरूप को
विशद करने के लिए अभिज्ञान-शाकुन्तल नाटक के पाठान्तरों को उदाहरण के रूप में लिए
जायेंगे ।।
[ 1 ]
निम्न स्तरीय ( Lower
Criticism ) प्राथमिक
पाठालोचना से जो हाँसिल किया जाता है, वह 1. एक ही कृति का पाठ कितनी शाखाओं (
वाचनाओं ) में विभक्त है?-वह जाना जाता है ।, 2. उन शाखाओं में से जिसका पाठ
प्राचीनतर/प्राचीनतम या सर्व-साधारण होगा, उसको अधिकृत पाठ के रूप में
प्रतिष्ठापित किया जाता है ।, 3. अन्य शाखान्तरों ( वाचनान्तरों ) के ( अथवा किसी
एक ही वाचना से सम्बद्ध, किन्तु उसकी अग्राह्य/उत्तरवर्ती काल की पाण्डुलिपियों के
) पाठान्तरों एवं प्रक्षेपादि का पादटिप्पणी में निर्देश किया जाता है । किसी भी
सही समीक्षितावृत्ति में ये तीन प्रधान गुणवत्ताएं समाहित होती हैं । इस तरह की
पाठालोचना के मार्गदर्शक ग्रन्थ के रूप में भाण्डारकर ओरिएन्टल रिसर्च
इन्स्टीट्युट, पूणें के द्वारा प्रकाशित महाभारत की समीक्षितावृत्ति गणनार्ह है ।
एवञ्च, एम. एस. युनिवर्सिटी, वडोदरा की ओरिएन्टल इन्स्टीट्युट के द्वारा प्रकाशित
वाल्मीकीय रामायण की समीक्षितावृत्ति भी अवलोकनीय है ।।
किन्तु, अभिज्ञानशाकुन्तल
की समीक्षितावृत्ति का किस्सा कुछ अलग ही है । जैसे कि, प्राचीन भारत की प्रादेशिक
लिपियाँ, ( जैसी कि- बंगाली, मैथिली, शारदा, नेवारी, ग्रन्थ, तेलुगु, नन्दीनागरी,
देवनागरी आदि ) उन सब लिपियों में लिखित अभिज्ञानशाकुन्तल की शताधिक पाण्डुलिपियाँ
मिलती हैं । अतः अलग अलग विद्वानों ने इनमें से किसी एक (ही) लिपि में लिखी गई
पाण्डुलिपियाँ एकत्र करके, उस एक प्रदेश की पाण्डुलिपियों में संचरित हुए पाठ की
आलोचना करके, उस प्रदेश के पाठ की समीक्षितावृत्ति तैयार की है । जिसके फल स्वरूप
अद्यावधि बंगाली वाचना, मैथिली वाचना, काश्मीरी वाचना तथा देवनागरी वाचनाओं के
समीक्षित पाठ सम्पादित किये गये हैं । ( दाक्षिणात्य वाचना के समीक्षित पाठ का
प्रकाशन अभी तक नहीं हुआ है । किन्तु काटयवेमभूप की टीका के साथ जो पाठ प्रकाशित
हुआ है, उसे प्रकृत चर्चा में दाक्षिणात्य वाचना का पाठ हम मान लेते हैं । ) पहले
बताया है कि इन वाचनाओं के समीक्षित पाठ निश्चित करने के लिए जो प्रविधि का
विनियोग हुआ है, उसको निम्न स्तरीय ( Lower Criticism ) पाठालोचना कहते हैं । किन्तु यहीं पर पाठालोचना की समाप्ति नहीं होती है । क्योंकि
यहाँ तक जो भी कार्य किया गया है, वह केवल दस्तावेजीय प्रमाणों ( यानि
पाण्डुलिपियों ) के आधार पर ही हुआ है । लेकिन पाण्डुलिपियों में प्रतिबिम्बित हुए
पाठ से बाहर भी निकल कर हमें कुछ सोचना चाहिए ।। इसी लिए, पहले तीन सोपानवाली
पाठालोचना को निम्न स्तरीय पाठालोचना कही जाती है ।। उसके बाद, चतुर्थ सोपान पर
खडी उच्चतर समीक्षा का महत्त्वपूर्ण कार्य करना आवश्यक बनता है । क्योंकि इसके द्वारा (क) मूल कवि/शास्त्रकार/ग्रन्थकार अभिप्रेत हो ऐसा, या (ख) जिसको हम अधिक
श्रद्धेय पाठ कह सकते है, ऐसे पाठ का पुनर्गठन किया जा सकता है[3]
।
[ 2 ]
उच्चतर समीक्षा के सन्दर्भ
में, सब से पहले यही ज्ञातव्य है कि उच्चतर समीक्षा का लक्षण क्या है?- तो
पाण्डुलिपियों के दस्तावेजीय प्रमाणों से बाहर निकल कर, जब (क) बहिरंग प्रमाणों का
सहारा लेकर परम्परागत पाठ की सच्चाई की परीक्षा की जाती है, तो उसे उच्चतर समीक्षा
कहते है । एवञ्च, (ख) कृतिनिष्ठ आन्तरिक सम्भावना क्या हो सकती है?उस पर विचार
किया जाता है, तब वह भी उच्चतर समीक्षा के दायरे में आता है । (ग) कृति के रचयिता
की शैलीगत विशेषता को भी एक प्रमाण के रूप में उपयोग में लेकर, जब अमुक पाठ्यांश
के मौलिक होने, न होने के विषय में निर्णय लिया जाता है, तब वह भी उच्चतर समीक्षा
के कार्यक्षेत्र में आता है । (घ) तदुपरान्त, कुछ भौगोलिक या ऐतिहासिक तथ्य के
आधार पर, या तर्कसम्मत प्रकरण-संगति के समर्थन से परम्परागत पाठ की प्रामाणिकता
निश्चित की जाती है, तब उसे भी उच्चतर समीक्षा कही जाती है ।। इन चतुर्विध बिन्दु
से जब परम्परागत पाठ की समीक्षा की जाती है, तो उनसे 1. कृति के रचयिता ( या अमुक
निश्चित पाठ्यांश के कर्तृत्व ) का निर्णय हो सकता है । अथवा मूल ग्रन्थकार के
अभिमत पाठ का निर्धारण किया जाता है । ( इसका फलितार्थ यह है कि परम्परागत पाठ में
हुए प्रक्षेप एवं संक्षेपादि का निश्चय हो सकता है । ) 2. संशयग्रस्त पाठ्यांश के
प्रणयन का कालखण्ड एवं स्थल निश्चित किये जाते हैं । 3. समीक्ष्यमाण कृति का
पुरोगामी स्रोत कौन रहा होगा?वह निश्चित हो सकता है ।। अलबत्ता, यहाँ एक विशेष
बात, अभिज्ञानशाकुन्तल के पूर्वोक्त[4]
सन्दर्भ में कहनी आवश्यक है कि इस नाटक की पाँचों वाचनाओं के पाठान्तरों का
इतिहासानुप्राणित[5]
तुलनात्मक दृष्टि से अभ्यास करने से ही उच्चतर समीक्षा फलदायिनी हो सकती है[6]
।।
[ 3 ]
बहिरंग प्रमाण:उच्चतर
समीक्षा का उपर्युक्त लक्षण एवं प्रयोजन सम्बन्धी परामर्श को विशद करने के लिए कालिदास
के अभिज्ञानशाकुन्तल नाटक के कतिपय पाठान्तरों के उदाहरण लेना रसप्रद सिद्ध होगा ।
तृतीयांक के आरम्भ में एक रंगसूचना मिलती है:-- ततः प्रविशति कामयानावस्थो राजा
। यह काश्मीरी वाचना में मिलता पाठ है । उसके विरोध में मैथिली एवं बंगाली वाचनाओं
में ततः प्रविशति मदनावस्थो राजा । ऐसी रंगसूचना देखी जाती है । तथा
दाक्षिणात्य एवं देवनागरी वाचनाओं के पाठ में ततः प्रविशति कामयमानावस्थो राजा
। अब पाठालोचक के सामने जब तीन तरह के पाठान्तर आकर खडे रहते हैं, तब प्रश्न
होता है कि इनमें से कालिदास को अभिप्रेत हो, या कालिदास ने लिखा हो ऐसा कौन सा
शब्द हो सकता है?। यहाँ पर अलग अलग प्रादेशिक वाचनाओं ने तो अपनी अपनी परम्परागत
पाण्डुलिपियों में संचरित होकर पाठान्तर आया था, उसके समीक्षित पाठ के रूप में रख
लिया है । किन्तु इस एक नाटक की पाँच वाचनाओं में तीन तरह के पाठभेद प्रचलन में
हैं, तो स्वाभाविक है कि किस वाचना के पाठ को प्रामाणिक माना जाय- ऐसा विवाद उठेगा
ही । इस स्थिति में, कोई कहेगा कि बहुसंख्य वाचनाओं में उपलब्ध होनेवाले पाठभेद को
अधिक श्रद्धेय मान लिया जाय । इस दृष्टि से सोचेंगे तो, इस नाटक की कुल मिला कर पाँच
वाचनाओं में से दो वाचनाएं मदनावस्थो राजा- को अग्रेसारित करती है, और दो
वाचनाएं कामयमानावस्थो राजा-को स्वीकारती हैं । तथा केवल एक काश्मीरी वाचना
ही ऐसी है कि, जो कामयानावस्थो राजा- को मान्य कर रही है । अतः
संख्याबाहुल्य से हम किसी भी तरह से किसी भी निर्णय पर पहुँच नहीं सकते हैं ।। ऐसी
स्थिति में हमें पाण्डुलिपियों/वाचनाओं के साक्ष्य से बाहर निकल कर कोई बहिरंग
प्रमाण को ढूँढना चाहिए । वामन ने काव्यालंकारसूत्रवृत्ति में कामयानशब्दः
सिद्धोऽनादिश्च । ( 5-2-82 ) ऐसा एक सूत्र लिखा है । ( यानि कामयान शब्द को
सिद्ध मानना चाहिए, यदि वह अनादि काल से चला आरहा है तो । ) वानम ने केवल इसी एक
ही शब्द के लिए सूत्र बना कर, कामयान शब्द को साधु मानने की शिफारिश की है ।
एवमेव, इसी कालिदास कवि ने रघुवंश ( 19-50 ) में भी इसी कामयान शब्द का प्रयोग
किया ही है । तथा उस श्लोक में कोई पाठान्तर नहीं है । यानि बहुत पहले से यह
कामयान शब्द चल रहा है, उसका प्रमाण वामन, और उससे भी पहले कालिदास में ही मिल रहा
है । इस बहिरंग प्रमाण से हम निश्चित कर सकते हैं कि काश्मीरी वाचना में"ततः
प्रविशति कामयानावस्थो राजा" इन शब्दों से जो रंगसूचना प्राप्त हो रही है, वही कवि
कालिदास के हाथों से लिखी गई होगी ।।
इसी तरह से, ( तृतीयांक के
अन्त भाग में ) जब गौतमी रंगमंच पर आकर शकुन्तला को अपने साथ आश्रम में वापस ले
जाती है, तब दुष्यन्त के मुख में एक श्लोक हैः—मुहुरङ्गुलिसंवृत्ताधरोष्ठं
प्रतिषेधाक्षर-विक्लवा-ऽभिधानम् । मुखमंसविवर्ति पक्ष्मलाक्ष्याः कथमप्युन्नमितं,
न चुम्बितं तु ।। ( 3-32 ) ऐसा पाठ काश्मीरी, दाक्षिणात्य एवं देवनागरी
वाचनाओं में मिलता है । लेकिन मैथिली एवं बंगाली वाचनाओं में इसके अन्तिम चरण में"कथमप्युन्नमितं,
न चुम्बितं तत् ।"ऐसा पाठान्तर देखा जाता है । दुष्यन्त ने एकान्त की क्षणों
में शकुन्तला का मुख मूश्कील से उपर तो उठाया था, लेकिन उसको वह चुम्बन नहीं कर
पाया था । ऐसा वह अफसोस व्यक्त कर रहा है । यहाँ मैथिली एवं बंगाली पाठों में
मुखम् के साथ सुसंगत ऐसा तत् सर्वनाम-वाला पाठ व्याकरण-सम्मत दिख रहा है । तथा
उसके प्रतिपक्ष में, जो "कथमप्युन्नमितं, न चुम्बितं तु ।"ऐसा काश्मीरी
वाचना का पाठ है, उसमें तु- निपात अनर्थक पादपूरक के रूप में प्रतीत हो रहा है ।
तो यहाँ पर भी अधिक श्रद्धेय पाठ का निर्णय करने के लिए बहिरंग प्रमाण के रूप में
आनन्दवर्धन ने इस श्लोक का जो उद्धरण दिया है, उसका विनियोग करना होगा ।
ध्वन्यालोक में निपातों की व्यंजकता की चर्चा करते समय आचार्य आनन्दवर्धन ने इसी
श्लोक को उद्धृत किया है, और उसमें "कथमप्युन्नमितं, न चुम्बितं तु ।"ऐसा
ही पाठ हमारे सामने रखा है । इसका मतलब यह होता है कि 10वीं शती में, आनन्दवर्धन
के सामने इस नाटक का जो पाठ रहा होगा, उसमें तत् नहीं था, किन्तु तु ऐसा ही पाठ था
।।
एवञ्च, इस बात की ओर भी
ध्यान देना आवश्यक है कि अभिज्ञानशाकुन्तल एक
नाट्यकृति है । यानि यह तो एक अभिनेय काव्य है । रंगकर्मि लोग उसका मंचन
करते है । इसी लिए मूल कवि कालिदास ने ही यहाँ "कथमप्युन्नमितं, न चुम्बितं तु ।"ऐसा
लिखा होगा । क्योंकि कोई भी नट दुष्यन्त का पात्र अभिनीत करते समय, जब पङ्क्ति के
अन्त में रहे, तु-कार का उच्चारण करेगा, तब उसके ओष्ठ वर्तुलाकार की स्थिति में आ
जायेंगे, जो हकीकत में चुम्बन क्रिया के समय पर होनेवाली मुखमुद्रा होती है!यदि
रंगकर्मि लोग मैथिली या बंगाली पाठान्तर के अनुसार, व्याकरण-सम्मत तत्- सर्वनाम का
उच्चारण करेगा, तो तब उसके ओष्ठ चुम्बन की मुद्रा को धारण नहीं करेंगे । यानि इन
दोनों पाठान्तरों में से नाट्यकार कालिदास ने क्या लिखा होगा?उसका विचार करेंगे तो
सभी नाट्यविशारद लोग"कथमप्युन्नमितं, न चुम्बितं तु ।"को ही पसंद करेंगे ।
क्योंकि वही पाठ आङ्गिक अभिनय के योग्य और प्रसंगोचित प्रतीत होता है ।।
[ 4 ]
आन्तरिक
सम्भावना:अभिज्ञानशाकुन्तल नाटक की पाँचों वाचनाओं के पाठान्तरों का जो स्वरूप
प्राधान्येन देखा जा सकता है, वह प्रक्षेपों से या संक्षिप्त किये गये पाठ्यांशो
से भरा पडा है । उनमें किसी भी पाठालोचक की मति भ्रमित हो सकती है । एक ओर ऐसे
विद्वान् हैं जो मिथिला एवं बंगाल के बृहत्पाठ को ही सर्वाधिक श्रद्धेय या मौलिक
कह रहे हैं । दूसरी ओर ऐसे बहुत सारे विद्वान् हैं कि जो लघुपाठ को ही मौलिक मानने
के पक्ष में है । ( कालिदास ने तो मूल में संक्षिप्त पाठ ही लिखा था, और पूर्वीभारत
के पाठशोधकों ने कुछ नवीन श्लोक लिख कर, नाटक के प्रचलित पाठ में प्रक्षिप्त कर
दिये हैं- ऐसा माननेवाले विद्वानों में श्रीईश्वरचन्द्र विद्यासागर से शूरु करके
डॉ. रेवाप्रसाद द्विवेदी जैसे धुरन्धर विद्वान् है । यद्यपि सर्वांश में बृहत्पाठ ही
मौलिक हो सकता है, तथा कालान्तर में दाक्षिणात्य रंगकर्मियों ने अल्पसमयावधि में
इस नाटक को रंगमंच पर प्रस्तुत करने के लिए लघुपाठ बनाया है- इस तरह के हमारे मत
की उपस्थापना कुछ विस्तार की अपेक्षा रखता है । इस लिए स्थलसंकोच के कारण
अंगुलिनिर्देश करके हम आगे बढते हैं । ) यहाँ तो, केवल प्रक्षिप्त श्लोक को कैसे
हम पहचान सकते है?और उसमें उच्चतर समीक्षा कैसे कार्यान्वित होती है- वही दिखाना
है । मैथिली और बंगाली वाचनाओं में तृतीयांक के आरम्भ में, राजा शकुन्तला को
ढूँढने के लिए मध्याह्न में प्रवृत्त होते हैं- उस प्रसंग में कुछ श्लोक रखे गये
हैं । उनमें से एक श्लोक ऐसा हैः—संमीलन्ति न तावद् बन्धनकोशा-स्तयावचितपुष्पाः
। क्षीरस्निग्धाश्चामी दृश्यन्ते किसलयच्छेदाः ।। ( 3 - 7 ) यह श्लोक मैथिली
एवं बंगाली वाचनाओं के पाठ में उपलब्ध होता है । उससे विपरीत, काश्मीरी,
दाक्षिणात्य एवं देवनागरी वाचनाओं में यह श्लोक नहीं है । इस श्लोक के शब्दों से
मालूम होता है कि दुष्यन्त अनुमान कर रहा है कि कुछ क्षण पहले ही शकुन्तला उसी
मार्ग से गई है । क्योंकि शकुन्तला ने जिन पुष्पों का चयन किया है, उसके बन्धनकोश
अभी तक संमीलित नहीं हुए है, और किसलयों के च्छेदों में से निकल रहा दूध भी अभी
देखा जा रहा है । अब, यहाँ एक क्षण में हम कह सकते हैं कि यह श्लोक प्रक्षिप्त ही
है । क्योंकि कवि कालिदास ने चतुर्थांक में हमें कहा है कि यह निसर्ग-कन्या
शकुन्तला "नादत्ते प्रियमण्डनापि भवतां स्नेहेन पल्लवम्"!इसको अपना शरीर
सुशोभित करना पसंद था, फिर भी वह वनस्पतियों के प्रति स्नेह होने के कारण, उनसे एक
पर्ण भी तोडती नहीं थी । यहाँ कवि ने शकुन्तला का जो चरित आरम्भ से निरूपित किया
है, उससे विरुद्ध जानेवाला श्लोक जहाँ भी प्राप्त होता है, उसको आन्तरिक सम्भावना
से असमर्थित कहा जायेगा । तथा उसी कारण से उसको प्रक्षिप्त घोषित किया जाता है ।।
आन्तरिक सम्भावना से
पाठान्तरों के विवाद को कैसे निरस्त किया जाता है?- उसका दूसरा निदर्श भी कथनीय है
। इस नाटक की प्रस्तावना में, नटी के गीत को सुन कर सूत्रधार कहता है कि- आर्ये,
सुष्ठु गीतम्, एष हि, गीतरागावबद्धचित्तवृत्तिरालिखितो सर्वतो रंगः । तदिदानीं
कतमत् प्रकरणम् आश्रित्य जनम् आराधयामः । ( यह पाठ काश्मीरी, दाक्षिणात्य एवं
देवनागरी वाचनाओं में उपलब्ध होता है । ) इससे विपरीत मैथिली एवं बंगाली वाचनाओं
के पाठों में तत् कतमं प्रयोगम् आश्रित्यैनमाराधयामः । ऐसा पाठान्तर मिलता है । (
किसी टीकाकार ने कतमेन प्रयोगकरणेन एनम् आराधयामः- ऐसा तीसरा पाठान्तर भी
उद्धृत किया है, जिसमें प्रकरण एवं प्रयोग दोनों शब्दों का संयोजन कर दिया है । )
अब, प्रश्न होगा कि कालिदास ने सम्भवतः क्या लिखा होगा । इसका निर्णय करने के लिए,
हमें पाण्डुलिपियों/वाचनाओं के प्रमाण से ( या संख्याबल से ) बाहर निकल जाना है ।
जैसे ही हम सूत्रधार की उक्ति के नीचे आयी हुई नटी की उक्ति पढते है तो वह बोल रही
हैः—ननु प्रथममेव आर्येणाज्ञप्तम्, यथा अभिज्ञानशकुन्तला नाम अपूर्वम् नाटकं
प्रयोगेणाधिक्रियताम् इति । नटी सूत्रधार को याद दिलाती है कि आपने प्रारम्भ
में रंगमंच पर आकर कहा था कि- आर्ये, अभिरूप-भूयिष्ठा परिषद् । अस्यां च किल
कालिदासग्रथितवस्तुना नवेनाभिज्ञानशकुन्तला नाम नाटकेनोपस्थातव्यम् अस्माभिः ।
यहाँ आगे और पीछे वाले वाक्यों में नाटक शब्द का विनियोग हुआ है, तो बीच
में कैसे प्रकरण शब्द आ गया?। अब समग्र कृति के कथाप्रवाह की ओर दृष्टिपात
करने से मालूम होता है कि इस नाटक में आगे चल कर नायक दुष्यन्त शकुन्तला को भूल
जाता है, यानि इस कृति में एक विस्मृति की घटना घटित होनेवाली है । उसी का एक
सांकेतिक लघुरूप यहाँ प्रस्तावना में कवि ने रखा हो सकता है । नटी के गीत के
प्रभाव में सूत्रधार रागावबद्ध चित्तवृत्तिवाला हो गया, और क्षणार्ध के लिए वह भूल
जाता है कि उसे नाटक खेलना था कि प्रकरण खेलना था?!दुष्यन्त भी रागावबद्ध
चित्तवृत्तिवाला हो गया था । इस बात का ध्वनन करने के लिए, सम्भव है कि कवि
कालिदास ने ही प्रकरण शब्द को लिखा होगा । जिन रंगकर्मियों के ध्यान में इस व्यंजना
नहीं आयी होगी, उन्होंने"प्रकरण तो दश अंक का होता है, यहाँ सूत्रधार के मुख में
कैसे वह शब्द आ गया?"ऐसा सोच कर, प्रकरण जैसे मौलिक शब्द को हटा कर, उसके स्थान
में प्रयोग जैसा निर्दोष पाठान्तर रख दिया होगा ।।
[ 5 ]
कृतिनिष्ठ आन्तरिक प्रमाण:तृतीयांक में, दुष्यन्त मध्याह्न की वेला में प्रिया शकुन्तला को ढूँढता हुआ मालिनी नदी के तट पर पहुँचता
है । लतावलय में सखियों के साथ शकुन्तला को देख कर उसके मुख में से वाक्य निकलता
हैः- अये, लब्धं मया नेत्रनिर्वाणम् । यह पाठ सभी वाचनाओं में एक समान है ।
केवल काश्मीरी वाचना में"अये, लब्धं मया नेत्रनिर्वापणम्"ऐसा पाठभेद मिल
रहा है । यहाँ एक ओर चार वाचनाओं का पाठ है, तो दूसरी ओर केवल काश्मीरी वाचना का
पाठ अकेला है । संख्याबल से सोचेंगे तो नेत्रनिर्वाणम् का पक्ष लेना पडेगा । यदि,
काश्मीरी वाचना का पाठ, जो सब से प्राचीनतम शारदा लिपि में लिखा हुआ मिलता है,
इसलिए नेत्रनिर्वापण पाठ स्वीकारना पडेगा । अन्तिम निर्णय करना दुःसाध्य लगता है ।
पाण्डुलिपियों के प्रतिलिपिकरण की प्रक्रिया को ध्यान में लेंगे तो, किसी लिपिकार
ने अनवधानवशात् निर्वापण के स्थान में निर्वाण ऐसा लिख दिया होगा । अथवा किसी
लिपिकार ने प्रमादवशात् निर्वापण के स्थान में निर्वाण लिख दिया हो सकता है । इसी
को अनुलेखनीय सम्भवना-जनित पाठान्तर कहा जाता है । यानि इस उदाहरण में तो दोनों
तरह की सम्भावना है!इस दूसरे दृष्टिबिन्दु से भी, अन्तिम निर्णय करना दुःसाध्य ही
सिद्ध हो रहा है ।। किन्तु इसी अंक के आरम्भ में, कण्वाश्रम का शिष्य आकाशोक्ति से
प्रियंवदा को पूछता है कि अरे, तुम किसके लिए यह उशीरानुलेप और नलिनीपत्र ले जा
रही हो?। तब प्रियंवदा ने प्रत्युत्तर दिया है कि- आतप-लङ्घनाद् बलवदवस्था
शकुन्तला, तस्याः शरीरनिर्वापणायेति । यहाँ पर, सभी वाचनाओं में एक समान
शरीरनिर्वापण शब्द ही मिलता है, इसमें दूसरा कोई पाठान्तर नहीं है । एवमेव, आगे चल
कर दुष्यन्त की उक्ति है कि"स्मर एव तापहेतुर्निर्वापयिता स एव मे जातः"(3-10)
। उसमें भी कोई पाठान्तर नहीं है । सर्वत्र निर्वापयिता ऐसा ही शब्द है । इसी तरह
से कृतिनिष्ठ आन्तरिक प्रमाणों से यहाँ निश्चित हो जाता है कि कवि कालिदास ने मूल
में अये लब्धं मया नेत्रनिर्वापणम् । ऐसे शब्द ही लिखे होंगे ।।
[ 6 ]
भौगोलिक सत्य का
प्रमाण:चतुर्थांक में शकुन्तला की बिदाई का प्रसंग निरूपित किया है । शकुन्तला ने जब
जाना कि सहेलियाँ उसके साथ हस्तिनापुर नहीं जा रही है, उसको अकेला ही ससुराल जाना
है । तब वह पिताजी को गले लगा कर एक वाक्य बोलती है :( पितुरङ्कमाश्लिष्य ) कधं
तादस्स अङ्कादो परिब्भट्ठा मलअपव्वदुम्मूलिदा विअ चन्दणलदा देसन्तरे जीविदं
धारइस्सं । ( कथं तातस्याङ्कात् परिभ्रष्टा मलय-पर्वतोन्मूलितेव चन्दनलता
देशान्तरे जीवितं धारयिष्यामि । ) इसी तरह का पाठ मैथिली, बंगाली, दाक्षिणात्य
एवं देवनागरी वाचनाओं में समान रूप से प्रचलित है । किन्तु काश्मीरी वाचना में इसी
वाक्य का सर्वथा भिन्न स्वरूप ( भिन्न उपमा-वाक्य ) मिलता है । जैसे कि, ( उत्थाय,
पितरमालिङ्ग्य ) कधं दाणिं तादेण विरहिदा करिसत्थपरिब्भट्ठा करेणुआ विअ पाणा
धारइस्सं । ( इति रोदिति । ) ( कथमिदानीं तातेन विरहिता करिसार्थपरिभ्रष्टा
करेणुकेव प्राणान् धारयिष्ये । ) अब इन दोनों उपमा-वाक्यो में से कालिदास ने
अपने हाथ से क्या लिखा होगा?यह प्रश्न विचारणीय है । एक ओर बहुसंख्यक वाचनाओं ( की
शताधिक पाण्डुलिपियों ) का साक्ष्य है, तो दूसरी ओर केवल पाँच काश्मीरी
पाण्डुलिपियों का साक्ष्य है, लेकिन काश्मीरी वाचना की पाण्डुलिपियाँ शारदा लिपि
में लिखी हुई है, जो प्राचीनतम है । किसका साक्ष्य शिरोधार्य हो सकता है?यहाँ पक्ष
एवं विपक्ष के समर्थन में एक ओर संख्याबल है, तो दूसरे के पास प्राचीनतमता का दावा
है । यहीं पर उच्चतर समीक्षा को कार्यान्वित करनी होगी । यहाँ एक हकीकत की ओर
पाठकों का ध्यान आकर्षित किया जाता है कि कण्व मुनि का आश्रम हिमालय की गोद में,
मालिनी नदी के तट पर आया हुआ है । वहाँ पर चन्दन के वृक्ष या चन्दन की लता का
प्रादुर्भाव नहीं होता है । वहाँ हिमालय के परिसर में जो अरण्य है, उसमें चन्दनलता
नहीं होती है । वहाँ तो केवल हाथियों के यूथ ही होते हैं । अतः शकुन्तला के सामने
करिसार्थ का होना वही हकीकत है । उसके मुख से करिसार्थ से परिभ्रष्ट हुई करेणुका
कितनी निःसहाय होती है, उद्विग्न होती है- उसका ही निर्देश होना सम्भव है । दूसरी
ओर मलय पर्वत का स्थान तो आज के केराला में है । दक्षिण कर्णाटक और केरळ प्रदेश
में ही चन्दनवृक्ष होते है, जो एक भौगोलिक सत्य है । अतः हिमालय में संवर्धित हुई
शकुन्तला के मुख में चन्दनलता का निर्देश होना नितान्त असम्भवित है । इस दृष्टि से
सोचना शूरु करेंगे तो, काश्मीरी वाचना का पाठ ही कालिदास के हाथों से लिखा गया
माना जायेगा ।। काश्मीरी पाठ का तात्पर्य ऐसा है कि शकुन्तला कण्व मुनि जैसे
वयोवृद्ध तपोवृद्ध पिता की छत्रच्छाया, जिसमें एनेक ऋषिकुमार, तापसकन्याएं, माता
गौतमी आदि भी आश्रय पा रहे हैं । उसमें से बाहर निकल कर, एकाकिनी बन कर वह कैसे
प्राण धारण कर सकेगी?इसमें शकुन्तला अपनी निःसहायता को शब्दबद्ध कर रही है । लेकिन
यदि मैथिली आदि वाचनाओं के पाठ को लेंगे तो उसमें शकुन्तला के कहने का भावार्थ ही
पूरा बदल जायेगा । यहाँ शकुन्तला ने अपने आप की तुलना चन्दनलता के साथ की है ।
जिसमें शकुन्तला की सुकुमारता केन्द्र में आ जाती है । इस पाठान्तर के द्वारा
प्रस्तुत हो रहे नवीन उपमान से पिता की जो छत्रच्छाया पहले कथनीय बिन्दु था, वह
अन्धेरे में चला जाता है । मैथिली वाचना[7]
के पाठ में प्रयुक्त हुई चन्दनलता की इस
नवीन उपमा का प्रसार बंगाली पाठपरम्परा में होने के साथ साथ, क्रमशः दाक्षिणात्य
और देवनागरी वाचनाओं में भी हुआ है । लेकिन यह पाठान्तर कथमपि मौलिक नहीं हो सकता-
ऐसा उपरि निर्दिष्ट उच्चतर समीक्षा से प्रमाणित हो जाता है ।।
[ 7 ]
प्रकरण संगति
की आवश्यकता :( संक्षेप का साधक-प्रमाण ) अभी तक हमने जिन उदाहरणों का परामर्श किया है,
उनमें पाठ-परिवर्तन एवं प्रक्षिप्त पाठ्यांश की पहचान कैसे होती है? उस पर विचार
किया है । लेकिन किसी नाट्यकृति में यदि कुत्रचित् अमुक अंश की कटौती की जाती है,
तो उस संक्षेपीकरण को कैसे पहचाना जायेगा- वह भी विचारणीय है । निम्न स्तरीय
पाठालोचना में तो पाण्डुलिपियों के साक्ष्य की संख्या, निर्दुष्टता, प्राचीनता,
लिपि-विशेष का कालखण्ड इत्यादि ध्यान में लेकर, अमुक वाचना-विशेष में अमुक पाठ
संचरित होकर हम तक पहुँचा है- इसका निर्णय किया जाता है । लेकिन जब किसी कृति में
संक्षेपीकरण की प्रवृत्ति से अमुक पाठ्यांश हटाया गया होता है, तब तो
पाण्डुलिपियों का प्राथमिक साक्ष्य ही चुप्पी लगा कर बैठा है । कोई भी पाठसम्पादक दस्तावेजीय
प्रमाण के अभाव में कैसे जान सकता है कि इस कृति में अमुक पाठ्यांश विनष्ट हुआ है?।
तो यहाँ पर, जब कोई पाठ्यांश विनष्ट हुआ हो, या जानबुज कर हटाया गया हो तो, उसका
अनुमान करने के लिए प्रकरण-संगति की परीक्षा करनी चाहिए । कथा-प्रवाह में जहाँ पर
भी विक्षेप आता है- ऐसा महसूस होता है, उस शंकास्पद स्थान का विश्लेषण करना आवश्यक
बन जाता है । यहाँ पर उच्चतर समीक्षा फलदायिनी बनती है । अभिज्ञानशाकुन्तल का एक
उदाहरण नेत्रोन्मीलन करनेवाला है । जैसे कि, ( दाक्षिणात्य एवं देवनागरी वाचनाओं
के तृतीयांक में ) शकुन्तला की दोनों सहेलियाँ मृगपोतक को उसकी माता के साथ
संयोजित करने के बहाने से दूर चली जाती है, तब एकान्त में दुष्यन्त शकुन्तला को
कहता है कि तेरा आराधन करनेवाला व्यक्ति तेरे पास में ही है । यदि तुम कहो तो- "अङ्के
निधाय करभोरु, यथासुखं ते संवाहयामि चरणावुत पद्मताम्रौ ।"(3-18) मैं तुम्हारे
पद्मताम्र तरणों का संवाहन करदुँ । तब शकुन्तला उठ कर वहाँ से चले जाने की इच्छा
करती है । किन्तु राजा तुरंत कहता है कि- सुन्दरि, अनिर्वाणो दिवसः । इयं च ते
शरीरावस्था, उत्सृज्य कुसुमशयनं नलिनीदलकल्पितस्तनावरणम् । कथमातपे गमिष्यसि
परिबाधा पेलवैरङ्गैः ।। (3-19) इन शब्दों से पाठक/दर्शक को मालूम होता है कि
इस प्रसंग का समय मध्याह्न का है । लेकिन इसके बाद, केवल छह उक्तियाँ आती है ।
जिसमें दुष्यन्त उस नायिका के अधरोष्ठ का रसपान करने की इच्छा प्रकट करता है ।
किन्तु उसी क्षण पर नेपथ्य से कहा जाता है कि- चक्रवाकवधूके, आमन्त्रयस्व सहचरम्,
उपस्थिता रजनी । इसके बाद रंगमंच पर गौतमी और दोनों सहेलियाँ आती है, शकुन्तला
को लेकर वे सब चले जाते है ।।
यहाँ हमारी तर्कबुद्धि यदि जागृत की जायेगी तो
प्रश्न होगा कि जो एकान्त मिलन की घटना मध्याह्न के समय में हो रही है, उसीके
सन्दर्भ में केवल छह उक्तियों के बाद रात्रि काल का आगमन कैसे हो गया?। यहाँ
समय-निर्देशक दोनों सूचनाएं परस्पर में विसंवाद पैदा कर रही है । वही बात हमें सूचित
करती है कि इन दोनों कालखण्ड के प्रसंगों के बीच में से कुछ पाठ्यांश हटाया गया हो
सकता है । जब हम अन्य तीन वाचनाओं के पाठों का तुलनात्मक अभ्यास करते हैं तो वहाँ
पर दो दृश्यों की प्राप्ति होती है!जिसमें तीनों मध्याह्न, सायंकाल और रात्रि काल
का प्रकट निर्देश मिलते हैं । इन दो दृश्यों में, 1. दुष्यन्त शकुन्तला को अपने
पास में बिठाता है और उसके हाथ में मृणाल-वलय पहनाता है । तथा 2. उसी समय बहती हवा
से शकुन्तला के कर्णोत्पल की रज उडती है और शकुन्तला का नेत्र कलुषित होता है । तब
दुष्यन्त उसको अपने वदनमारुत से प्रमार्जित कर देता है!( इन दोनों दृश्यों के लिए
12 श्लोक, और उसके आगे पीछे गद्य वाक्यावली का पाठ्यांश उपलब्ध होता है । जिसमें
नायक-नायिका का नैसर्गिक प्रेम-सहचार देखा जाता है । ) इस तरह की समय-निर्देशक
सूचनाओं में अन्तर्निहित विसंगति की ओर विद्वज्जगत् का ध्यान आकर्षित करनेवाले डॉ.
एस. के. बेलवालकर जी थे ।।
इसी दिशा में सोचते हुए,
इन दो दृश्यों की कटौती हुई है- उस बात का दूसरा प्रमाण हमारे ध्यान में आया हैः-
शकुन्तला को लेकर गौतमी रंगमंच से चली गई । राजा अब अकेले खडे है, वे कहते हैं कि
मैं इस लतावलय से जल्दी से बाहर नहीं जा सकता हूँ । क्योंकि इसमें मेरी प्रियतमा
की याद दिलानेवाली तीन चीज मौजुद है । इसका निरूपण करनेवाला श्लोक तीसरे अंक का
उपान्त्य श्लोक हैः—
तस्याः पुष्पमयी शरीरलुलिता शय्या(1) शिलायामियं,
क्लान्तो मन्मथलेख(2) एष नलिनीपत्रे नखैरर्पितः ।
हस्ताद् भ्रष्टमिदं बिसाभरणम्(3) इत्यासज्यमानेक्षणो,
निर्गन्तुं सहसा न वेतसगृहाच्छक्नोमि शून्याद् अपि ।। (3-23)
इसमें शकुन्तला की स्मृति को
सतेज करनेवाली 1. उसकी पुष्पशय्या, 2. उसने लिखा मदनलेख और 3. उसके हाथ से गिरा
बिसाभरण ( यानि मृणालवलय ) इन तीन चीजों का प्रकट उल्लेख हमें सोचने के लिए बाध्य
कर रहे हैं कि तीसरे अंक के घटनाचक्रम में पहले दो चीजों से जुडे दृश्य तो देखने
को मिलते हैं । लेकिन जो बिसाभरण ( मृणाल-वलय ) है, उससे जुडा हो ऐसा तो कोई
प्रसंग आकारित ही नहीं हुआ है । इससे सिद्ध होता है कि दाक्षिणात्य ( और
तदनुगामिनी देवनागरी ) वाचना के पाठ में से कुछ दृश्य को हटाया गया है । इन हटाये
गये दृश्यों की सुरक्षा काश्मीरी, मैथिली एवं बंगाली वाचनाओं के पाठ में हुई है ।
जिसमें दुष्यन्त ने शकुन्तला को अपने पास में बिठा कर, उसके हाथ में एक मृणाल-वलय
पहनाया था- ऐसा एक प्रेम-प्रसंग आया है ।। इस उच्चतर समीक्षा से दाक्षिणात्य एवं
देवनागरी पाठों में हुए संक्षेप का सबूत मिल जाता है ।।
[ 8 ]
नाट्य-निरूपण
की शैलीः- यह भी उच्चतर समीक्षा में,
परम्परागत पाठ की परीक्षा करने का महत्त्वपूर्ण मानदण्ड है । कालिदास ने इस नाटक
में एक रूप के सामने दूसरा प्रतिरूप खडा कने की विधा का विनयोग किया है । जैसे कि,
1. प्रथमांक में कण्व मुनि का आश्रम है, तो सप्तांक में मारिच ऋषि का आश्रम है ।,
2. विदूषक द्वितीयांक के आरम्भ में राजा की मृगयाशीलता से खिन्न है, उद्विग्न है,
रोता-धोता संत्रस्त उपलब्ध होता है । उसके सामने षष्ठांक के आरम्भ में, धीवर भी
नगररक्षकों से मारापिटा जा रहा है, अकाल वध के भय से संत्रस्त है । लेकिन
द्वितीयांक के अन्त भाग में वही विदूषक राजानुज की तरह ससैन्य वापस लौटता है, और
षष्ठांक के प्रथम दृश्य के अन्त में धीवर भी राजा के द्वारा प्रेषित पारितोषिक
मिलने से प्रसन्नता का अनुभव करता है ।, 3. शृङ्गारिक तृतीयांक के अन्त में,
यज्ञशाला में राक्षसोपद्रव को शान्त करने के लिए सान्ध्य वेला में धनुष्य उठा कर
प्रस्थान करता है, वैसे ही विप्रलम्भ शृङ्गारयुक्त षष्ठांक के अन्त में भी मातलि
से संत्रस्त हो रहे विदूषक को बचाने के लिए दुष्यन्त धनुष्य उठाता है । इत्यादि ।
इस तरह से समग्र नाट्यकृति में एक दृश्य के सामने दूसरा प्रतिरूप खडा करने की
नाट्यशैली का कवि ने प्रदर्शन किया है । यह शैली भी हमारे लिए कृतिनिष्ठ
अन्तःसाक्ष्य बनती है । जिसके सहारे काश्मीरी आदि तीन वाचनाओं में शकुन्तला के हाथ
में राजा ने जो मृणाल-वलय पहनाया था, और उसका नेत्र पुष्परज से कलुषित होने पर,
उसने उसको अपने वदनमारुत से प्रमार्जित कर दिया था- इस दृश्य का मौलिक होना सिद्ध
किया जा सकता है । शकुन्तला के नेत्र को प्रमार्जित करने का प्रसंग तृतीयांक में
मिलता है । उस रूप के सामने, षष्ठांक में राजा ने जो शकुन्तला का चित्र बनाया है,
उसमें वह"शृङ्गे कृष्णमृगस्य वामनयनं कण्डूयमानाम् मृगीम्"को आलिखित करने
की चाहना व्यक्त करता है, वही ( तृतीयांक के पूर्वोक्त रूप के सामने खडा किया )
प्रतिरूप है!एक रूप में प्रिया शकुन्तला के नेत्र को प्रमार्जित करने की बात है,
तो उसके सामने दूसरे प्रतिरूप में मृग के नोकिले सींग पर मृगी अपना नेत्र खुजला
रही हो- ऐसा चित्र बनाने की चाहत है । इससे यह प्रमाणित होता है कि जो दृश्य दाक्षिणात्य एवं देवनागरी वाचनाओं में से हटाये
गये हैं, और जिनकी प्राप्ति काश्मीरी-आदि वाचनाओं के पाठ में हो रही है, वे दृश्य
पूर्वोक्त नाट्यशैली के अनुरूप है, अतः मौलिक हो सकते है । इस कृतिनिष्ठ
अन्तःसाक्ष्य से विस्मृत हुए दो दृश्य को हम पुनः प्राप्त कर सकते हैं ।।
[ 9 ]
उपसंहार:अभिज्ञानशाकुन्तल
की पाँच वाचनाओं के समीक्षित पाठों के प्रकाशन से पाठालोचना की समाप्ति नहीं हो
जाती है । क्योंकि किसी भी समीक्षित आवृत्ति से जो भी हाँसिल किया जाता है, वह तो
किसी एक वाचना-विशेष का अधिकृत पाठ ही होता है । लेकिन हम जब ऐसी विविध वाचनाओं के
पाठों का इतिहासानुप्राणित तुलनात्मक दृष्टि से पुनः अभ्यास करते हैं, तथा उच्चतर
समीक्षा के क्षेत्र में सतर्क प्रवेश करते हैं, तभी अधिक श्रद्धेय एवं मूल कवि/ग्रन्थकार
को अभीष्ट हो ऐसे पाठ का पुनर्गठन कर सकते हैं । अभिज्ञानशाकुन्तल के मूल पाठ को पुनरपि
संप्राप्त करने का यही एक प्रामाणिक राजमार्ग है ।।
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सन्दर्भ ग्रन्थ सूचिः—
1. अभिज्ञानशकुन्तलम नाटकम् । (
मैथिलपाठानुगम् ), ( शङ्कर-नरहरिकृताभ्यां टीकाभ्याम् अलङ्कृतम् ), सं. रमानाथ झा,
प्रकाशकः मिथिला-विद्यापीठ, दरभङ्गा, 1957
2. अभिज्ञानशकुन्तलम् । ( पुनर्गठित
पाठ ), सं. दिलीपकुमार काञ्जीलाल, संस्कृत कॉलेज, कोलकाता, 1980
3. अभिज्ञानशकुन्तलम् । (
चन्द्रशेखर-चक्रवर्तिनः सन्दर्भदीपिकया समेतम् ), सं. वसन्तकुमार म. भट्ट,
प्रकाशकः - राष्ट्रिय पाण्डुलिपि मिशन, नई दिल्ली, 2013
4. अभिज्ञानशाकुन्तलम् । (
राघवभट्टकृतार्थद्योतनिकया टीकया समेतम् ), सं. नारायण राम, प्रकाशकः राष्ट्रिय
संस्कृत संस्थान, दिल्ली, 2006, ( जिसमें देवनागरी वाचना का पाठ है )
5. अभिज्ञानशाकुन्तलम् । ( काटयवेम
भूप-विरचित-टीकया सहितम् ), सं. चेलमचेर्ल रंगाचार्य, आन्ध्रप्रदेश साहित्य
अकादेमी, हैदराबाद, 1982 ( जिसमें दाक्षिणात्य वाचना का पाठ है )
6. भाण्डारकर ओरिएन्ट रिसर्च
इन्स्टीट्युट, पूणें में संगृहीत भूर्जपत्रवाली शारदा पाण्डुलिपि, जिसका क्रमांक
192 है, और जिसको ब्युह्लर ने 1875 में काश्मीर से प्राप्त किया था ।
7. Kalidasa’s Sákntala, the Bangali Recension,
Ed. Richard Pischel, Harvard University Press, second edition, 1922
8. Sharda Manuscripts, No. 1247, & 159 ( from
Oxford Uni. ), No. 1435 from Shrinagar.
( इन पाण्डुलिपियों के आधार पर मैं ने सम्पादित किया काश्मीरी वाचना का समीक्षित
पाठ सद्यः ही राष्ट्रिय संस्कृत संस्थान, दिल्ली से प्रकाशित होनेवाला है । )
9. नाट्यम् । ( अंक – 74, 75, 76,
77 ), सं. श्रीराधावल्लभ त्रिपाठी, सागर, 2014 से 2015
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[3] मतलब कि, आधुनिक पाठालोचना से जो समीक्षित पाठ तैयार किया जाता है, उसीको
पुरस्कृत करके "कवि या शास्त्रकार ने मूल में यही पाठ लिखा होगा"ऐसा दावा कथमपि
नहीं किया जा सकता हैं ।।
[5] द्रष्टव्यः-
अभिज्ञानशाकुन्तल के पाठविचलन की आनुक्रमिकता । इस शीर्षक से नाट्यम् ( अंकः- 76, सं.
श्री राधावल्लभ त्रिपाठी, सागर, 2014, पृ. 26 से 54 ) में प्रकाशित मेरा शोध-आलेख
।
[6] अभिज्ञानशाकुन्तल
की अद्यावधि जो पाठालोचना होती रही है उसमें वाचनाओं का ऐतिहासिक उत्क्रान्ति-क्रम
एवं तुलनात्मक दृष्टि का बहुशः अभाव ही रहा है । एक-दो अपवाद को छोड कर, सभी
पाठसम्पादक सम्यक्तया उच्चतर समीक्षा तक पहुँचे ही नहीं है ।।
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