पूर्व पाठ में हमने अधोलिखित
श्लोक के माध्यम से वर्णिक गणों पर विचार
किया था -
मस्त्रिगुरुस्त्रिलघुश्च नकारो, भादिगुरुः पुनरादिलघुर्यः ।
जो गुरुमध्यगतो रत्नमध्यः , योऽन्तगुरुःकथितोऽन्तलधुस्तः ।।
अर्थात- १- मगण- तीनो गुरु वर्ण २- नगण- तीनों लघु वर्ण
३-भगण- प्रथम गुरु अन्य दो लघु, ४- यगण-
प्रथम लघु, शेष दो गुरु ,५- जगण- मध्यम वर्ण गुरु, शेष दो लघु ६- रगण- मध्यम वर्ण
लघु. शेष दो गुरु ,७- सगण- अन्तिम वर्ण
गुरु शेष दो लघु ,८- तगण- अन्तिम
वर्ण लघु , शेष दो गुरु ।
निम्न श्लोक के माध्यम से भी
गणों को कंठस्थ किया जा सकता है –
आदिमध्यावसानेषु , य-र-ता यान्ति लाघवम् ।
आदिमध्यावसानेषु , य-र-ता यान्ति लाघवम् ।
भ-ज-सा गौरवं यान्ति , म-नौ तु गुरुलाघवम् ।।
संक्षिप्तरुप में हम इन्हें- ।। यामाताराजभानसलगम् ।। इस
प्रकार से भी अपने स्मृति पटल पर सुरक्षित कर सकते है ।
मात्रिक गण- मात्रिक छन्दो में
हम प्रत्येक पाद की मात्राओं की गणना करते है । प्रत्येक मात्रिक गण में ४
मात्राएँ होती है । मात्रगण ५ है ।उनके नाम एवं चिन्ह अधोलिखित है –
म - S S, न- I I, भ- S I I, ज –I S I, स- I I S
यति एवं गति-
यति- प्रत्येक श्लोक के
एक पाद में जितने अक्षरों का बाद
अल्प-विराम होता है, उसे हम यति कहते है । यति का अर्थ ही विराम, या विश्राम होता
है ।
गति- गति का अर्थ होता प्रवाह । श्लोक की धाराप्रवाहिता ही गति होती
है ।
अब हम क्रमशः प्रमुख छन्दो को उनके लक्षणो एवं उदाहरण के ,साथ समझने
का प्रयास करेंगे । जिसमें सर्वप्रथम आर्या छन्द तत्पश्चात समस्त छन्दों का अध्ययन
करेंगे ।
१- आर्या-
यस्यः प्रथमे पादे द्वादश
मात्रास्था तृतीयेऽपि ।
अष्टादश द्वितीये चतुर्थके पञ्चदश
साऽऽर्या ।।
यह मात्रिक छन्द है । इसके
प्रथम पाद में १२ मात्राएँ, तथा द्वितीय
में १८, तृतीय पाद में १२ मात्राएँ एवं चतुर्थ पाद में १५ मात्राएँ होती है ।
उदाहरण-
अपरितोषाद्विदुषां ,न साधुमन्ये
प्रयोगविज्ञानम् ।
बलवदपि शिक्षितानाम् , आत्मन्य प्रत्ययं
चेतः ।।[i]
शिव त्रिपाठी
गुरुवासरः
१२/०४/१८
क्रमशः------

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें