कण्व-संहिता- सम्पूर्ण कण्व
संहिता में ४० अध्याय कुल २०८९ मंत्रो का संकलन किया गया है , वजसनेयी संहिता से १११ मंत्र अधिक है । इसमें
३२८ अनुवाक है । इसका सर्वाधिक प्रचार
प्रसार उत्तर भारत (महाराष्ट्र) में है ।
कृष्ण यजुर्वेद (ब्रह्म सम्प्रदाय)
कृष्ण-यजुर्वेद की कुल ८६ शाखाएं
मानी जाती है । जिसमे ४ उपलब्ध है-
१- तैत्तिरीय
२- मैत्रायणी
३- कठ
४- कपिष्ठल
तैत्तीय संहिता- यह कृष्ण-यजुर्वेद
की सबसे प्रमुख शाखा मानी जाती है, यह काण्डों में विभक्त है । इसमें कुल ७ काण्ड
है ४४ प्रपाठक और ६३१ अनुवाक है । यह शाखा
वेदों में सर्वाङ्गपूर्ण शाखा है जिसमें
इसके ब्रह्मण, आरण्यक, उपनिषद, गृह, श्रौत, धर्म, शुल्व इत्यादि सभी
प्राप्त होते है ।
इसमें यागुष्ठानों का वर्णन है , इसका अधिक प्रचार महाराष्ट्र ,एवम्
आन्ध्रप्रदेश में अधिक है ।
मैत्रायणी संहिता- इस संहिता में 4
काण्ड ५४ प्रपाठक २१४४ मंत्र है । मुख्यरूप से इसमें ऋग्वेद के १७०१ मंत्र लिए गये है ,जिसमें सर्वाधिक
प्रथम, षष्ठम् एवं दशम् के मंत्रो को
संकलित किया गया है ।
काठक संहिता- कृष्ण यजुर्वेद की
इस शाखा में ४० स्थानक
८४३ अनुवाक है । इसमें मंत्रो की संख्या ३०९१ है । मंत्र ब्राह्मणो के
सम्मलित शाखा में कुल मंत्रो की संख्या १८ हजार है , इसमें भी यागादि
का ही वर्णन प्राप्त होता है ।
कपिष्ठल संहिता- यह शाखा अधूरी ही
प्राप्त हुई है , जिसमें ६ अष्टकों में ४८ अध्याय है । इसकें मंत्रो पर भी ऋग्वेद
का ही अधिक प्रभाव प्राप्त होता है ।
प्रतिशाख्य ग्रन्थ-
कृष्ण-यजुर्वेद-
१- तैत्तिरीय
प्रतिशाख्य
शुक्ल-यजुर्वेद-
१- वाजसनेयी प्रतिशाख्य (कात्यायन कृत)
शिक्षा- ग्रन्थ-
कृष्ण-यजुर्वेद-
१- व्यास शिक्षा
२- वाशिष्ठी शिक्षा
३- माण्डव्य शिक्षा
४- भारद्वाज शिक्षा
शुक्ल-यजुर्वेद-
१- याग्यवल्क्य शिक्षा
२- माध्यान्दिन शिक्षा
कल्प सूत्र
कृष्ण-यजुर्वेद-
(क) श्रौत सूत्र-
१- बौधायन
२- आपस्तम्ब
३- सत्याषाण
४- वैखानस
५- भारद्वाज
६- कठ
७-
वाधूल
८- वाराह
९- मानव
१०-
मैत्री
(ख) गृह सूत्र-
१- कठ
२- आपस्तम्ब
३- बौधायन
४- वैखानस
५- भारद्वाज
६- वाधूल
(ग)
धर्म सूत्र-
१- विष्णु
२- वशिष्ठ
३- आपस्तन्ब
४- बौधायन
५- हिरण्यकेशी
६- वैखानस
(घ)
शुल्व सूत्र-
१- मानव
२- बौधायन
३- आपस्तम्ब
४- मैत्रायणी
५- वाराह
६- वाधूल
शुक्ल-यजुर्वेद-
(क) श्रौत सूत्र-
१- कात्यायन या पारस्कर
(ख) गृह सूत्र-
१- कात्यायन या पारस्कर
(ग)
धर्म सूत्र
१.
हारीत
२.
शङ्क
(घ)
शुल्व सूत्र-
१.
कात्यायन
ब्रह्मण-ग्रन्थ
शुक्ल-यजुर्वेद- शतपथ ब्रह्मण शुक्ल यजुर्वेद का एकमात्र
ब्राह्मण ग्रन्थ है- इसके दो पाठ प्राप्त
होते है-
(क) माध्यन्दिनशाखीय इसमें १४काण्ड १०० अध्याय है ।
(ख) कण्वशाखीय इसमें १७काण्ड १०४ अध्याय है ।
इसके रचनाकार याज्ञवल्क्य ऋषि माने
जाते है ।
प्रमुख प्रतिपाद्य विषय- इसमें प्रारम्भिक ९ काण्डो में शुक्ल
यजुर्वेद के १८अध्यायों की
व्याख्या की गई है ।दशपौर्णमास, अग्निहोत्र, चातुर्मास्य,
वाजपेय, राजसूय, अग्निरहस्य,
अश्वमेघ, पुरुषमेघ, आदि का विस्तृत वर्णन
प्राप्त होता है ।
पुरुरवा-उर्वशी, दुष्यन्त पुत्र भरत, मत्स्य जलप्लावन, तथा मनु की कथाएं
प्राप्त होती है । इसमे सर्वप्रथम साख्य
आचार्य आसुरि तथा पाण्डय राजा जनमेजय का उल्लेख
है । बौद्ध साहित्य में प्राप्त पारिभाषिक
शब्द अर्हत श्रमण प्रतिबुद्धि का सर्वप्रथम
प्रयोग इसी में प्राप्त होता है ।
विशेष- शुक्ल-यजुर्वेद का वस्तुतः कोई आरण्यक ग्रन्थ
नही है , शतपथ ब्राह्मण की माध्यन्दिन एवं कण्व दोनों शाखाओं के अंतिम ६ अध्यायों
को वृहदारण्यक उपनिषद् कहा जाता है ।
कृष्ण-यजुर्वेद -तैत्तिरीय ब्राह्मण कुल ३ काण्डो में
विभक्त प्रथम में अग्न्याधान, वाजपेय, सोम, राजसूय, आदि का वर्णन , द्वितीय में सौत्रामणि, वृहस्पति आदि का वर्णन , तृतीय अध्याय
में नक्षत्रेष्टि का मुख्यरुप सें वर्णन
प्राप्त होता है ।
विशेष- इसके
अन्य शाखाओं के ब्राह्मण अप्राप्त है ।
आरण्यक-ग्रन्थ
(क) तैत्तिरीय आरण्यक
(ख) मैत्रायणी आरण्यक
तैत्तिरीय आरण्यक- यह तैत्तिराय शाखा
का आरण्यक ग्रन्थ है । इसमें कुल १० परिच्छेद या प्रपाठक है । इसमें अग्नि की
उपासना , इष्टका चयन, स्वाध्याय,
पञ्चमहायज्ञ, अभिचार मंत्र, तथा पितृमेघ आदि का वर्णन प्राप्त होता है । इसी में
कुरुक्षेत्र, खाण्डव, पांञ्चाल , आदि
भौगोलिक नामों का उल्लेख प्राप्त होता है ।
विशेष- इसके १० प्रपाठक को नारायणीय उपनिषद् कहा जाता
है ।
मैत्रायणीय आरण्यक- इस आरण्यक में कुल ७ प्रपाठक है एवं आरण्यक
एवं उपनिषद् के अंश सम्मलित है ।
विशेष- (क)
इशोपनिषद्, वृहदारण्यकोपनिषद् आदि १९ उपनिषद् शुक्ल यजुर्वेद के माने जाते है ।
(ख) कृष्ण-यजुरवेद के कठ, तैत्तिरीय, श्वेताश्वर, कैवल्य, आदि
३२ उपनिषद् प्राप्त होते है ।
वेद परिचय के
क्रम में आज द्वितीय खण्ड समाप्त होता है ।
शिव त्रिपाठी
शनिवासरः २८/०४/१८
क्रमशः

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