अब हम क्रमशः छन्द के
बारे में अध्ययन करेंगे चलिए
सर्वप्रथम हम छन्द शब्द का अर्थ एवं उसके प्रमुख विभागो पर चर्चा करेंगे ।
१-
‘छन्दस्’ शब्द के
दो अर्थ होते है- १. आच्छादन ।छन्दसि छादनात् । इसके द्वारा भावों एवं रसों को आच्छादित किया जाता है ।
२. आह्लादन ।
आह्लादन अर्थ वाली चन्द् धातु से छन्दस् शब्द बनता है ।
प्रमुख रुप से हम छन्द को दो प्रकार से विभक्त करते है -१- वृत्त २- जाति
वृत्त - वर्ण वृत्त या
मात्रिक छन्द भी इसे कहते है, इसमे प्रत्येक पाद के गणो की गणना की जाती है । जैसै- उपेन्द्रवज्रा, इन्द्रवज्रा इत्यादि ।
जाति- इसे
मात्रिक छन्द भी कहते है । इसमे प्रत्येक पाद मात्रगणों की गणना की जाती है ।
जैसे- आर्या इत्यादि ।
छन्दशास्त्र के प्रमुख आचार्य
एवं तत्सम्बन्धी उनके ग्रन्थ-
आचार्य ग्रन्थ सम्भावित समय
१-
आ.पिंगल छन्दसूत्रम् ६०० इ.पू.
२-
कालिदास श्रुतबोध ५७ इ.पू.
३-
क्षेमेन्द्र
सुवृततिलक
१०५० इ.पू.
४-
हेमचन्द्र छन्दोऽनुशासन १०८० इ.पू.
५-
केदारभट्ट
वृत्तरत्नाकर १२ वी शताब्दी
६-
अज्ञात प्राकृतपैंगलम् १२ वी श.
७-
जयदेव छन्दोऽनुशासन १४ वी श.
८-
गंगादास छन्दोमंजरी १५ वी श.
९-
दामोदर
मिश्र वाणीभूषण १६ वी श.
१०-
दुःखभंजन वाग्वल्लभ १९ वी. श.
छन्द के भेद- ३ प्रकार के है- १. समवृत्त २.
अर्धसमवृत्त ३. विषमवृत्त
१-
समवृत्त- इसके चारों पादो की
संख्या बराबर बराबर होती है ।जैसे वसन्ततिलका , इन्द्रवज्रा इत्यादि ।
२-
अर्धसमवृत्त- इसके प्रथम तृतीय एवं द्वितीय चतुर्थ चरणों में समानता होती है । जैसे- वियोगिनी,
पुष्पिताग्रा इत्यादि ।
३-
विषमवृत्त- इसके प्रत्येक पाद
के वर्णो की संख्या विषम होती है । जैसे- उद्गाता, गाथा इत्यादि ।
लघु-गुरू विचार- जैसा कि नाम से
विदित होते है – लघु अर्थात हृस्वस्वर- अ,इ,उ,ऋ,लृ ये समस्त लगु की श्रेणी में आते
है । लघु स्वर के बाद यदि अनुस्वार, संयुक्त, य विसर्ग युक्त व्यंजन होगा तो लघु
स्वर भी गुरु माना जाता है । पाद का अन्तिम लघु स्वर आवश्यकतानुसार गुरु भी माना
जाता है ।
गुरु अर्थात दीर्घस्वर - आ,ई,ऊ,ए,ऐ,ओ,औ,ऋ... इति ये सभी दीर्घ स्वर की
श्रेणी मे आते है ।
सानुस्वारश्च दीर्घश्च , विसर्गी च गुरुर्भवेत् ।
वर्ण संयोगपूर्वश्च , तथा पादान्तगो ऽपि वा ।।[i]
गण-विचार- (क) वर्णिक गण- वर्णिक छन्दो की गणना के लिए गणो
का उपयोग किया जाता है । एक गण मे तीन अक्षर होते है ।
मस्त्रिगुरुस्त्रिलघुश्च नकारो, भादिगुरुः पुनरादिलघुर्यः ।
जो गुरुमध्यगतो रत्नमध्यः ,
योऽन्तगुरुःकथितोऽन्तलधुस्तः ।।[ii]
शिव
त्रिपाठी
गुरुवासरः १०/०४/१८
क्रमशः ......

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