ऋग्वेद-परिचय[i]
ऋग्वेद में ३३ देवों के सूक्तों का वर्णन प्राप्त होता है । जिसमे
२० देवों के विषय में ३से अधिक सूक्त मिलते है । इमसे सबसे प्रमुख है-
१.
इन्द्र पर सर्वाधिक २५० सूक्त प्राप्त होते है ।
२.
अग्नि पर
२००सूक्त है ।
३.
सोम पर १००
सूक्त है ।
४. पर्जन्य एवं यम पर केवल ३ सूक्त ही प्राप्त होते है ।
ऋग्वेदीय आख्यान
१- विष्णु के तीन (त्रिविक्रम) १-१५४ वामनावतार वलि की कथा ।
२- पुरुरवा-उर्वशी संवाद सूक्त १०-९५
३- यम-यमी संवाद १०-१०
४- सोम-सूर्या सूक्त १०-८५
५- विश्वमित्र-नदी- ३-३३
६- श्यावाश्व सू. ५-६१- श्यावाश्या एवं राजा रथवीती की कन्या
का प्रणय का वर्णन ।
७-
सरमा
-पाणि संवाद सूक्त १०-१०८
८- माण्डूक्य सू. ७-१०३ वेदपाठी ब्रह्मणों की तुलना मेढक से की गई है ।
९- अक्षसूक्त १०-३४ इसमें द्यूतक्रीडा के दोष वर्णित एवं कृषि कार्य को श्रेष्ठ बताया
गया है ।
१०-
इन्द्र-मरुत संवाद सू. १-१६५-१-१७०तक ।
११-
इन्द्र-इन्द्राणी
संवादन सू. १०-८६
१२-
अगस्त-लोपामुद्रा
संवाद १-१७९
१३-
इन्द्र-वृत्र
युद्ध वर्णन २-१२
ऋग्वेदीय ब्रह्मणग्रन्थ
ऐतरेय ब्रह्मण- कुल ४० अध्याय ५-५
अध्यायों कि ८ पञ्चिकायों में विभक्त , इसमें मुख्यरुप से सोमयाग का वर्णन प्राप्त होता है । सोमयाग से
सम्बन्धित अग्निष्टोम, गवामनय, द्वादशाह, अग्निहोत्रादि का वर्णन वाद में
राज्याभिषेक एवं कुलपुरोहित के अधिकार का वर्णन । अंतिम १०
अध्यायों में उपख्यान एवं इतिहास का वर्णन
है ।
v सप्तम पञ्चिका ३ अध्यायों (३१-३३) अध्याय में प्रसिद्ध
शुनःशेप का आख्यान है , जो चरैवेति-चरैवेति
के कारण विख्यात है ।
v इसके रचयिता महिदास ऐतरेय मानें जाते है ।
शांखायन ब्रह्मण(कौषितकि)-इसमें भी सोमयाग प्रधान विषय है ,इसमें ३० अध्याय है जिसमें
अग्न्याधान, अग्निहोत्र, दशपौर्णमास एवं चातुर्मास्यइष्टियों का वर्णन प्राप्त होता
है ।
प्रतिशाख्य ग्रन्थ- शाकल शाखा का शौनक
रचित ऋक् प्रतिशाख्य ।
शिक्षा ग्रन्थ- पाणिनीय शिक्षा ।
आरण्यक ग्रन्थ - (क) ऐतरेयाण्यक (ख) शांखायन आरण्यक
ऐतरेय आरण्यक- इसमें १० अध्याय है , जिन्हे पांच भागों
विभक्त किया गया है । इन भागों को
आरण्यक कहते है । इसमें उकथ् (निश्कैवल्यशास्त्र)
महाव्रत, प्राण विद्या और पुरुष का विवेचन है ।
शांखायन आरण्यक-इसमें १५ अध्याय है । इसमें ३-६ अध्याय को कौषितकि उपनिषद् कहते है । इसमें महाव्रतों आदि का एवं काशी,
विदेह,कुरु,पञ्चाल आदि का उल्लेख है ।
ऋग्वेदीय उपनिषद्
ऐतरेय उपनिषद्- ऐतरेय आरण्यक के
४से६ अध्यायों का नाम ऐतरेय उपनिषद् है । इमसे कुल ३ अध्याय प्रथम अध्याय
में ३खण्ड है , द्वितीय अध्याय में १ खण्ड
है एवं तृतीय अध्याय में भी एक ही खण्ड
है । इस उपनिषद् में विश्व की उत्पत्ति का विवेचन प्राप्त होता है ।
द्वितीय अध्याय में जन्म , जीवन
,मरण, का वर्णन प्राप्त होता है , तथा आत्मा क स्वरुप का वर्णन तृतीय अध्याय में
है। प्रज्ञानं ब्रह्म महावाक्य ऐतरेय उपनिषद् में प्राप्त होता है ।
कौषितकि उपनिषद्- कौषितकि आरण्यक के
३से ६ अध्याय का भाग कौषितकि उपनिषद कहा जाता है । इस उपनिषद् को ब्रह्मणोपनिषद्
भी कहा जाता है ।इसमें कुल ४ अध्याय है अध्याय खण्डो में विभक्त
है -
१.
प्रथम
अध्याय ७खण्ड में देवयान-पितृयान
वर्णन ।
२.
द्वितीय
अध्याय १५खण्ड में आत्मा के प्रतीक का
वर्णन ।
३.
तृतीय
अध्याय ९खण्ड में प्रतर्दन
से इन्द्र सीखते है।
४. चतुर्थ अध्याय
२०खण्ड अजातशत्रु एवं जाबालि के आख्यान के प्रसंग में परब्रह्म का विवेचन
इस अध्याय में है ।
ऋग्वेद के कुल१० उपनिषद् माने
जाते है जिसमें प्राप्त उपनिषद् दो ही है ,
कल्पसूत्र
‘’ कल्पो वेदविहितानां कर्मणामानुपूर्वेण कल्पना शास्त्रम् ’’
(क)
श्रौतसूत्र- महत्वपूर्ण वैदिक
यज्ञो का क्रमबद्ध वर्णन-यज्ञो में प्रमुख- दर्श, पौर्णमास,
सोमयाग,वाजपेय,राजसूय,सौत्रामणि,अश्वमेघ आदि ।
ऋग्वेदीय
श्रौत सूत्र- अश्वलायन और शाखायन
(ख)
गृह्य सूत्र- इसमें
१६संस्कारो ५महायज्ञो, ७पाकयज्ञो,गृह
निर्माण, गृहप्रवेश,पशुपालन, रोगनाशक,विधियो का वर्णन ।
ऋग्वेदीय गृह्य सूत्र-आश्वलायन, शांखायन, और कौषितकि गृह्य
सूत्र है।
(ग) धर्म सूत्र-इसमें नीति, धर्म, रीति, प्रथाओं, चारो वर्णों और आश्रमों के कर्तव्यों और सामाजिक नियमों का वर्णन है ।
ऋग्वेदीय धर्म सूत्र- वशिष्ठ एवं विष्णु
धर्मसूत्र ।
(घ) शुल्व सूत्र-यज्ञवेदी सम्बन्धित नाप आदि वेदी
निर्माण आदि के नियमों का उल्लेख इस सूत्र
किया गया है ।
ऋग्वेदीय
शुल्व सूत्र- कात्यायन शुलव सूत्र ।
ऋग्वेद का रचना काल
निर्धारण[ii]
सन्१९०७ में एशिया माइनर
के बोगाजकोइ स्थान में एक संधि पत्र
शिलालेख प्राप्त हुआ ,जो १४०० इ.पू. के प्रारम्भ में मितानि और हिटाइट लोगों के
बीच हुई थी ।
जिसमें
दोनों जातियों के निजि देवों के साथ हि साक्षी रुप में मित्र, वरुण, और इन्द्र , नासत्यौ देवों
का उल्लेख प्राप्त होता है । ये सभी वैदिक देवता है, अतः सिद्ध होता है मूल चारो वेदों की रचना १४००इ.पू. हो चुकी थी ।
पाश्चात्य विद्वानों के विभिन्न मत-
१. स्वामी दयानन्द
आधार वेदमंत्र सृष्टि के
प्रारम्भ में
२. दीनानाथ शास्त्री
आधार ज्योतिष ३ लाख वर्ष
पूर्व
३. रघुनन्दन शर्मा
ज्योतिष ८८हजार
वर्ष पूर्व
४. अविनाशचन्द्र दास
भूगर्भ २५हजार
वर्ष पूर्व
५. नारायण भवनराम पावगी
भूगर्भ ज्योतिष ७हजार वर्ष
पूर्व
६. बालगंगाधर तिलक
ज्योतिष ६हजार
वर्ष पूर्व
७.
शंकर बालकृष्ण
दीक्षित ज्योतिष ३५०० इ.पू.
८. याकोवि
ज्योतिष
४५००से२५०० इ.पू.
९. विन्टरनित्स
मितानि शिलालेख २५००इ.पू.
१०.
मैक्समूलर बौद्धसाहित्य १२०० इ.पू.
‘’प्रमुख वैदिक देवताओं का परिचय एवं
तत्सम्बन्धित मुख्य तत्व’’[iii]
अग्नि- ऋग्वेद १/१ ऋषि – मधुच्छदा
पृथ्वी स्थानीय २०० सूक्त ऋग्वेद का प्रथम शब्द ‘अग्निमीळे पुरोहितम् । राजान्तमध्वराणाम्। स
नः पितवे सूनवे ’ अन्य नाम अग्नि के-
१.
ऋत्विक्
२.
जातवेदस्
३.
घृतपृष्ठ
४. रूक्मदन्तः
५. गृहपति
६. दमूनस्
७. पुरोहित
८.
धूमकेतु
९.
वैश्वानर
१०.
घृतमुख
११.
नेता
१२.
कविक्रतुः
१३.
पावकः
१४.
अंगिरा
सवितृ- ऋषि- गृत्समद व हिरण्यस्तूप द्युस्थानिक
११ सूक्त
अन्य नाम-
१.
स्वर्ण नेत्र
२.
पाद
३.
हस्त
४. असुर
५. मधुजिह्वा
विष्णु- ऋषि- दीर्घतमा द्युस्थानिक ५ सूक्त
अन्य नाम-
१- त्रिविक्रम
२- उरुक्रम
३- उरुगाय
४- कुचर
५- गिरिष्ठा
६- गिरिजा
७-
मातरिश्वा
८- यज्ञ स्वरुप
९- अर्च्य देव
इन्द्र- ऋग्वेद २/१२
ऋषि- गृत्समद अन्तरिक्षस्थानिक २५० सूक्त
(सर्वाधिक) अन्य नाम-
१- वज्रिन
२- वज्रबाहु
३- शचीपति
४- मरुत्वान
५- मघवा
६- अच्युतच्युत
७-
सुशिप्र
८- निजित
९- हरिश्मश्रु
१०-
मनस्वान
११-
सोमपा
१२-
पुरन्दर
१३-
वसुपति
प्रमुख मंत्राश- यो जात एव प्रथमो मनस्वान । येनेमा विश्वा च्यवना कृतानि । यो रध्रस्य
चोदिता यः कृशस्य
। यस्याश्वासः प्रदिशि यस्य गावो ।
यं क्रन्दसी संयती
विह्वयेति । द्यावा चिदस्मै
प्रथिवी नमेते । यः सुन्वन्तमवति यः पचन्तम् ।
सुवीरासो वि दशमावेदम ।
रुद्र- ऋषि-
गृत्समद अन्तरिक्षस्थानीय ३ सूक्त
अन्य नाम-
१- द्रुतगामी
२- प्रचेतस्
३- उग्र
४- तूर्णी
५- मयस्करः
६- नीलोदरः
७-
नीलकण्ठ
८- लोहितपृष्ठ
९- कपर्दी देव
अश्विनौ- ऋषि- कक्षीवान् व वशिष्ठ द्युस्थानीय
काल- अर्धरात्रि से सूर्योदय पूर्व
तक ५०
सूक्त ।
अन्य नाम-
१- नासत्य
२- निचेतस
३- मधुयुवा
४- मधुपाणि
५- शुभ्रस्पति
६- नृपति
७-
वृषणा
८- गोमघा
बृहस्पति- ऋषि- वामदेव पृथ्वीस्थनीय ११ सूक्त
अन्य नाम-
१- सप्तमुख
२- सप्तरश्मि
३- नीलपृष्ठ
४- ब्रह्मणस्पति
५- वाचस्पति
६- मरुत्सखा
७-
गणपति
८- शक्तिपुत्र
९- सुगोपा
१०-
द्युतिमान
सोम- ऋषि- कण्व पृथ्विस्थानीय १२० सूक्त
अन्य नाम-
१- मौंजवत
२- पवमान
३- विश्वजित
४- उरुशंस
५- सुसखा
६- वयोधाः
७-
गिरिष्ठाः
पुरुष- ऋषि- नारायण
ऋग्वेद-१०/९० प्रमुख मंत्राश-
तस्माद विराडजायत । तस्माद यज्ञात् सर्वहपतः । इत्यादि १६ मन्त्र ।
क संज्ञक
प्रजापति- ऋषि- प्रजापति पुत्र हिरण्यगर्भ
ऋग्वेद १०/१२१ त्रिष्टप छन्द ।
प्रमुख मंत्राश- य आत्मदा बलदा यस्य विष्व । यस्येमे हिमवन्तो महित्वा ।
यं क्रन्दसी अवसा
तस्तभाने । वयं स्याम
पतयो रणीयाम् ।
नासदीय- ऋग्वेद- १०/१२९
ऋषि – परमेष्ठी नाम प्रजापति दार्शनिक
सूक्त ७ मंत्र।
प्रमुख मंत्राश- नासदासीन्नो सदासीत्तदानीम् । तमः आसीत
तमसा गूढमग्रे । कामरतग्रे
समवर्ताधि तिरश्चीनो वितो
रश्मिरेषामधः । को अद्धा वेद क इह
प्र वोचत् ।
वाक्- ऋग्वेद-१०/१२५
पिता –अम्भृण
प्रमुख मंत्राश- अहम् शब्द से अनेक मंत्र प्रारम्भ होते है - मया सो अन्नमत्ति यो विपश्यति ।
पृथ्वी- ऋषि- अथर्वा
शौनक आथर्वेद १२/१
कुल ६२ मंत्र
प्रमुख मंत्राश- सत्यं बृहदृतमुग्रं दीक्षा तपो ।
यस्यां समुद्र उत
सिन्धु रापो । ये ते पन्थानो बहवो
जनायना । यस्ते सर्पो वृश्चिकस्तृष्टदश्मा। निधिं बिभ्रती बहुधा
गुहावसु ष त्वज्जातास्तवयि चरन्ति
।
ऋग्वेद मण्डलों (परिवार)के
ऋषि-
१- शतार्चिन १९१ सूक्त
२- गृत्समद् ४३ सू. (वंश मण्डल प्रारम्भ)
३- विश्वामित्र ६२
सू.
४-
वामदेव ५८ सू.
५-
अत्रि ८७ सू.
६-
भारद्वाज एवं
उनके वंशज ७५ सू.
७-
वशिष्ठ १०४ सू. (वंश मण्डल समाप्त)
८- कण्व १०३ सू. (वालखिल्य सूक्त)
९- मधुच्छदा
११४ सू. (पवमान मण्डल)
१०-
भृगु १९१ सू.
नोट-ऋग्वेद का समान्य संक्षिप्त परिचय समाप्त हुआ, अग्रिम द्वितीय खण्ड में यजुर्वेद का अध्ययन करेंगे ।
ऋग्वेद-परिचय[i]
ऋग्वेदीय आख्यान
ऋग्वेदीय ब्रह्मणग्रन्थ
ऋग्वेदीय उपनिषद्
कल्पसूत्र
ऋग्वेद का रचना काल
निर्धारण[ii]
‘’प्रमुख वैदिक देवताओं का परिचय एवं
तत्सम्बन्धित मुख्य तत्व’’[iii]
![]() |
शिव त्रिपाठीगुरुवासरः २६/०४/१८ |


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