
‘ यजुर्जयतेः यज्ञः’-
‘ इज्यतेऽनेनेति यजुः ’- ‘
अनियताक्षररावसानो यजुः’- ‘ शेषे यजुः शब्दः ’ ।
यजुर्वेद का मुख्य प्रतिपाद्य विषय कर्मकाण्ड
है । इसका ऋत्विक् अध्वर्यु होता है
। यजुर्वेद के मुख्य देवता वायु माने
जाते है । यजुर्वेद के आचार्य ऋषि वैशम्पायन है ।
यह वेद पूर्णतया गद्यात्मक
रुप में है । यजुर्वेद दो प्रमुख सम्प्रदायों मे विभक्त है-
(क) ब्रह्म सम्प्रदाय (कृष्ण यजुर्वेद)
(ख) आदित्य सम्प्रदाय (शुक्ल यजुर्वेद)
विनियोगामिश्रितत्वं शुक्लत्वम्- अर्थात जिसमे विशुद्ध मंत्रो का
संकलन है वह शुक्ल यजुर्वेद है ।
विनियोगव्याख्याविवरणमिश्रित्वं
कृष्णत्वम्- अर्थात जिसमें व्याख्या, विवरण, एवं विनियोग मिश्रित है वह कृष्ण
यजुर्वेद है ।
पतञ्जलि जी के अनुसार ‘एकशतमर्ध्युशाखाः’
(महा. १ आ.)
सर्वानुक्रमणी एवं कूर्मपुराण
में भी १०० शाखाओं का उल्लेख प्राप्त होता है ।
चरणव्यूह में ८६ शाखाओं का उल्लेख किया गया है ।
शुक्ल-यजुर्वेद- प्रमुख दो शाखाए प्राप्त होती है –
(क) माध्यान्दिन या वाजसनेयी संहिता
(ख) काण्व संहिता
माध्यान्दिन शाखा- सम्पूर्ण ४० अध्यायों एवं ३०३ अनुवाकों में विभक्त कुल १९७५ मंत्र (कण्डिकाएं) है ।
प्रमुख प्रतिपाद्य विषय अध्याय क्रमानुसार
अध्याय प्रतिपाद्य विषय
१ से २ दशपौर्णमास इष्टियाँ
३
अग्निहोत्र,चतुर्मास्य इष्टियाँ
४ से ८
सोमयाग,अरिष्टहोम,तीनोसवन
९ से १०
वाजपेय, राजसूय
यज्ञ
११ से १८ अग्निचयन , वेदीनिर्माण(10800इंटे)
१९ से २१ सौत्रामणी यज्ञ
२२ से २५
अश्वमेघ यज्ञ
२६ से २९ खिलमंत्रो का पूर्वोक्त अनुष्ठान
३० पुरुषमेघ
३१
पुरुषसूक्त, विराटपुरुषवर्णन
३२ से ३३
सर्वमेघ
३४
शिवसंकल्पसूक्त
३५
पितृमेघ
३६ से ३८
प्रवर्ग्ययाग
३९
नरमेघ अंत्येष्टि
४०
इशोपनिषद्
शिव त्रिपाठी
शुक्रवासरः 27/04/18
क्रमशः
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