ऋग्वेद- खण्ड-प्रथम
हमारा वैदिक साहित्य विश्व
का सबसे प्राचीनतम सहित्य है । वैदिक साहित्य का प्रथम
ग्रन्थ ऋग्वेद ही है । यह भारतीय संस्कृति के आधारस्तम्भ का रुप प्रतिष्ठित है ।
इष्ट की प्राप्ति एवं अनिष्ट के परिहार के अलौकिक उपाय को बतलाने
वाला ग्रन्थ वेद ही है । वेद शब्द अनेक प्रकार से हमारे व्याकरण शास्त्र में प्रयुक्त होता है , विद्
सत्तायम्, विद् ज्ञाने, विद् विचारणे, तथा विदलृ लाभे इत्यादि धातुओं से यह शब्द
निष्पन्न होता है ।
ऋग्वेद सामान्य परिचय- ‘ ऋच्यते स्तूयतेऽनया इति ऋक्’ ऋग्वेद संहिता के
प्रवचनकर्ताओं में सर्वप्रथम नाम आता है-पैल ऋषि का ऋक् का समान्य अर्थ है
स्तुतिपरक मंत्रो से , ऋग्वेद का ऋत्विक् है-होता ।
ऋग्वेद
में १० मण्डल ८ अष्टक् १०२८ सूक्त ८५
अनुवाक् है ।
१.
महाभारत के अनुसार इसकी २१ शखाएं प्राप्त होती है
जिसमें ५ शाखाएं वर्तमान में उपलब्ध है-
(क)
शाकल
(ख)
वाष्कल
(ग)
शांखायन्
(घ)
आश्वलायन
(ङ)
माण्डूकायन
ध्यातव्य-
आचार्य पतञ्जली जी ने भी २१ शाखाओं का
उल्लेख अपने महाभाष्य ग्रन्थ पर किया है-
एकविशंतिधावाहवज्यम् (महा. १ आ.)
ऋग्वेद का वर्ण्य
विषय-
प्रथम मण्डल - अग्नि , इन्द्र, मरुत, और
अश्विनौ की स्तुति , तथा इन्द्रवायु, मित्रावरूणौ,
विश्वदेवा. सविता, पूर्षा. आप,वरुण, उषस, रुद्र, सोम, सूर्य, विष्णु, इत्यादि,
देवो से सम्बन्धित मंत्रो का स्तुतिपरक प्रतिपादन ।
द्वितीय मण्डल – अग्नि, इन्द्र, ब्रह्णस्पति, वृहस्पति, विश्वेदेवा, मरुत्,
राका (पूर्णिमा) ,सिनीमाली, सरस्वती आदि
देवताओं का वर्णन इस मण्डल में प्राप्त होता है ।
तृतीय मण्डल- अग्नि यूप, इन्द्राग्नी, विश्वामित्र नदी संवाद ।
चतुर्थ मण्डल- अग्नि,रूद्र, श्येन, द्यावापृथवी,वायु,क्षेत्रपति ,सीता आदि ।
पञ्चम् मण्डल-अग्नि,इन्द्र, विश्वेदेवा, अत्रि, मित्रावरुणौ, अश्विनौ, पर्जन्य, पृथवी आदि ।
षष्ठम मण्डल- अग्नि, इन्द्र, विश्वेदेवा, गाव, उषा, रथ, धनु आदि ।
सप्तम मण्डल- अग्नि, इन्द्र. नदी, वरुण,
सरस्वती, मण्डूका आदि ।
नवम मण्डल – पवमान , सोम ।
दशम मण्डल – यम-यमी संवाद (सू.१४) अक्षाः सूक्त (सू. ३४) मन सू.(५८) ज्ञानम्
(सू. ७१) पुरुष सूक्त (सू.९०) पुरुरवा-उर्वशी संवाद (सू.९५) सरमा-पाणि संवाद (सू. १०८) प्रजापति सू ( सू. १२१) भाववृत्तयम् नासदीय सू. (सू.१२९) श्रद्धा सू. (सू.१५१) संज्ञानम् सू. (सू. १९१)
ऋग्वैदिक देवता विचार- निरुक्तकार यास्क ने अनुसार (अ.७से१२ तक) देवता काण्ड में को कुल ३ भागों में बाटा है-


अग्निस्थानिक अन्तरिक्षस्थानिक द्युस्थानिक
अग्नि इन्द्र या वायु सूर्य
देवता
|
लोक
|
सवन
|
ऋतु
|
छन्द
|
स्तोम
|
साम
|
संबद्ध देवता
|
अग्नि
|
पृथवी
|
प्रातः
|
बसन्त
|
गायत्री
|
त्रिवृत
|
रथन्तर
|
इन्द्र,सोम वरुण आदि
|
इन्द्र
|
अन्तरिक--क्ष
|
माध्यदिन
|
ग्रीष्म
|
त्रिष्टुप
|
पञ्चदश वृहत
|
वृहत
|
अग्नि,सोम,
विष्णु
|
सूर्य
|
द्युलोक
|
सायं
|
वर्षा
|
जगती
|
सप्तदश
|
वैरुप
|
चन्द्रमा,वाक्
सम्वत्सर
|
नोट- ऋग्वेद में देवों की संख्या ३३ बताई गयी है , उन्हे ११*११=३३ त्रिगुण एकादश भी कहा जाता है ।
शिव त्रिपाठी
बुधवासरः २५/०४/१८
क्रमशः

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